श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.40

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तद् यथा वृक्ष उन्मूलः शुष्यत्युद्वर्ततेऽचिरात्।

एवं नष्टानृतः सद्य आत्मा शुष्येन्‍न संशयः॥ ४०

tad yathā vṛkṣa unmūlaḥ śuṣyatyudvartate'cirāt|

evaṃ naṣṭānṛtaḥ sadya ātmā śuṣyenna saṃśayaḥ|| 40

अर्थ

जैसे जड़ न रहनेपर वृक्ष सूखकर थोड़े ही दिनोंमें गिर जाता है, उसी प्रकार यदि धन देनेसे अस्वीकार न किया जाय तो यह जीवन सूख जाता है—इसमें सन्देह नहीं॥ ४०॥

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