॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.19.36
न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्यते।
दानं यज्ञस्तपः कर्म लोके वृत्तिमतो यतः॥ ३६
na taddānaṃ praśaṃsanti yena vṛttirvipadyate|
dānaṃ yajñastapaḥ karma loke vṛttimato yataḥ|| 36
अर्थ
विद्वान् पुरुष उस दानकी प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाहके लिये कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है—वही संसारमें दान, यज्ञ, तप और परोपकारके कर्म कर सकता है॥ ३६॥