जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो रहता है, उसके तेजकी वृद्धि होती है। उसके असन्तोषी हो जानेपर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है जैसे जलसे अग्नि॥ २६॥
यदृच्छालाभतुष्टस्य तेजो विप्रस्य वर्धते।
तत् प्रशाम्यत्यसंतोषादम्भसेवाशुशुक्षणिः॥ २६
जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो रहता है, उसके तेजकी वृद्धि होती है। उसके असन्तोषी हो जानेपर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है जैसे जलसे अग्नि॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 995) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/26/