बस, अब उससे वैरभाव रखनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देहके साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोधका कारण अज्ञान है और अहंकारसे उसकी वृद्धि होती है॥ १३॥✎ 793
वैरानुबन्ध एतावानामृत्योरिह देहिनाम्।
अज्ञानप्रभवो मन्युरहंमानोपबृंहितः॥ १३
बस, अब उससे वैरभाव रखनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देहके साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोधका कारण अज्ञान है और अहंकारसे उसकी वृद्धि होती है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 994) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्को