श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अथैकोनविंशोऽध्यायः

भगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका
वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना

श्रीशुक उवाच

इति वैरोचनेर्वाक्यं धर्मयुक्तं ससूनृतम्।

निशम्य भगवान्प्रीतः प्रतिनन्द्येदमब्रवीत्॥ १

iti vairocanervākyaṃ dharmayuktaṃ sasūnṛtam|

niśamya bhagavānprītaḥ pratinandyedamabravīt|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजा बलिके ये वचन धर्मभावसे भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान् वामनने बड़ी प्रसन्‍नतासे उनका अभिनन्दन किया और कहा॥ १॥

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