॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.18.4
दिशः प्रसेदुः सलिलाशयास्तदा
प्रजाः प्रहृष्टा ऋतवो गुणान्विताः।
द्यौरन्तरिक्षं क्षितिरग्निजिह्वा
गावो द्विजाः संजहृषुर्नगाश्च॥ ४
diśaḥ praseduḥ salilāśayāstadā
prajāḥ prahṛṣṭā ṛtavo guṇānvitāḥ|
dyaurantarikṣaṃ kṣitiragnijihvā
gāvo dvijāḥ saṃjahṛṣurnagāśca|| 4
अर्थ
उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरोंका जल स्वच्छ हो गया। प्रजाके हृदयमें आनन्दकी बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वत—इन सबके हृदयमें हर्षका संचार हो गया॥ ४॥✎ 778