श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तत्पादशौचं जनकल्मषापहं

स धर्मविन्मूर्ध्न्यदधात् सुमङ्गलम्।

यद् देवदेवो गिरिशश्‍चन्द्रमौलि-

र्दधार मूर्ध्ना परया च भक्‍त्या॥ २८

tatpādaśaucaṃ janakalmaṣāpahaṃ

sa dharmavinmūrdhnyadadhāt sumaṅgalam|

yad devadevo giriśaścandramauli-

rdadhāra mūrdhnā parayā ca bhaktyā|| 28

अर्थ

भगवान्‌के चरणकमलोंका धोवन परम मंगलमय है। उससे जीवोंके सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने अत्यन्त भक्ति-भावसे उसे अपने सिरपर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्मके मर्मज्ञ राजा बलिको प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे अपने मस्तकपर रखा॥ २८॥✎ 790

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #790 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् की → वामनभगवान्‌की

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