भगवान्के चरणकमलोंका धोवन परम मंगलमय है। उससे जीवोंके सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने अत्यन्त भक्ति-भावसे उसे अपने सिरपर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्मके मर्मज्ञ राजा बलिको प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे अपने मस्तकपर रखा॥ २८॥✎ 790
तत्पादशौचं जनकल्मषापहं
स धर्मविन्मूर्ध्न्यदधात् सुमङ्गलम्।
यद् देवदेवो गिरिशश्चन्द्रमौलि-
र्दधार मूर्ध्ना परया च भक्त्या॥ २८
भगवान्के चरणकमलोंका धोवन परम मंगलमय है। उससे जीवोंके सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने अत्यन्त भक्ति-भावसे उसे अपने सिरपर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्मके मर्मज्ञ राजा बलिको प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे अपने मस्तकपर रखा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#790 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् की → वामनभगवान्की