श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

इन्द्रज्येष्ठैः स्वतनयैर्हतानां युधि विद्विषाम्।

स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रष्टुमिच्छसि दुःखिताः॥ १४✎ 1891

indrajyeṣṭhaiḥ svatanayairhatānāṃ yudhi vidviṣām|

striyo rudantīrāsādya draṣṭumicchasi duḥkhitāḥ|| 14

अर्थ

तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1891 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): द्रुष्टुमिच्छसि → द्रष्टुमिच्छसि

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