तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको॥ १४॥
इन्द्रज्येष्ठैः स्वतनयैर्हतानां युधि विद्विषाम्।
स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रष्टुमिच्छसि दुःखिताः॥ १४
तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.17.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 986) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/17/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1891 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): द्रुष्टुमिच्छसि → द्रष्टुमिच्छसि