श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अपि वातिथयोऽभ्येत्य कुटुम्बासक्तया त्वया।

गृहादपूजिता याताः प्रत्युत्थानेन वा क्‍वचित्॥ ६

api vātithayo'bhyetya kuṭumbāsaktayā tvayā|

gṛhādapūjitā yātāḥ pratyutthānena vā kvacit|| 6

अर्थ

यह भी सम्भव है कि तुम कुटुम्बके भरण-पोषणमें व्यग्र रही हो, अतिथि आये हों और तुमसे बिना सम्मान पाये ही लौट गये हों; तुम खड़ी होकर उनका सत्कार करनेमें भी असमर्थ रही हो। इसीसे तो तुम उदास नहीं हो रही हो?॥ ६॥

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