श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अदितिने जब कश्यपजीसे प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले—‘बड़े आश्चर्यकी बात है। भगवान्की माया भी कैसी प्रबल है! यह सारा जगत् स्नेहकी रज्जुसे बँधा हुआ है॥ १८॥✎ 748
एवमभ्यर्थितोऽदित्या कस्तामाह स्मयन्निव।
अहो मायाबलं विष्णोः स्नेहबद्धमिदं जगत्॥ १८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अदितिने जब कश्यपजीसे प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले—‘बड़े आश्चर्यकी बात है। भगवान्की माया भी कैसी प्रबल है! यह सारा जगत् स्नेहकी रज्जुसे बँधा हुआ है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 980) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)