श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवमभ्यर्थितोऽदित्या कस्तामाह स्मयन्‍निव।

अहो मायाबलं विष्णोः स्नेहबद्धमिदं जगत्॥ १८

evamabhyarthito'dityā kastāmāha smayanniva|

aho māyābalaṃ viṣṇoḥ snehabaddhamidaṃ jagat|| 18

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अदितिने जब कश्यपजीसे प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले—‘बड़े आश्‍चर्यकी बात है। भगवान्‌की माया भी कैसी प्रबल है! यह सारा जगत् स्नेहकी रज्जुसे बँधा हुआ है॥ १८॥✎ 748

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #748 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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