श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

हेमाङ्गदलसद‍्बाहुः स्फुरन्मकरकुण्डलः।

रराज रथमारूढो धिष्ण्यस्थ इव हव्यवाट्॥ ९

hemāṅgadalasadbāhuḥ sphuranmakarakuṇḍalaḥ|

rarāja rathamārūḍho dhiṣṇyastha iva havyavāṭ|| 9

अर्थ

उनकी भुजाओंमें सोनेके बाजूबंद और कानोंमें मकराकृति कुण्डल जगमगा रहे थे। उनके कारण रथपर बैठे हुए वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो अग्‍निकुण्डमें अग्‍नि प्रज्वलित हो रही हो॥ ९॥

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