श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एवं स विप्रार्जितयोधनार्थ-

स्तैः कल्पितस्वस्त्ययनोऽथ विप्रान्।

प्रदक्षिणीकृत्य कृतप्रणामः

प्रह्रादमामन्त्र्य नमश्‍चकार॥ ७

evaṃ sa viprārjitayodhanārtha-

staiḥ kalpitasvastyayano'tha viprān|

pradakṣiṇīkṛtya kṛtapraṇāmaḥ

prahrādamāmantrya namaścakāra|| 7

अर्थ

इस प्रकार ब्राह्मणोंकी कृपासे युद्धकी सामग्री प्राप्त करके उनके द्वारा स्वस्तिवाचन हो जानेपर राजा बलिने उन ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा की और नमस्कार किया। इसके बाद उन्होंने प्रह्लादजीसे सम्भाषण करके उनके चरणोंमें नमस्कार किया॥ ७॥

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