॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.15.21
मृदङ्गशङ्खानकदुन्दुभिस्वनैः
सतालवीणामुरजर्ष्टिवेणुभिः ।
नृत्यैः सवाद्यैरुपदेवगीतकै-
र्मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम्॥ २१
mṛdaṅgaśaṅkhānakadundubhisvanaiḥ
satālavīṇāmurajarṣṭiveṇubhiḥ |
nṛtyaiḥ savādyairupadevagītakai-
rmanoramāṃ svaprabhayā jitaprabhām|| 21
अर्थ
मृदंग, शंख, नगारे, ढोल, वीणा, वंशी, मँजीरे और ऋष्टियाँ बजती रहती हैं। गन्धर्व बाजोंके साथ गाया करते हैं और अप्सराएँ नाचा करती हैं। इनसे अमरावती इतनी मनोहर जान पड़ती है, मानो उसने अपनी छटासे छटाकी अधिष्ठात्री देवीको भी जीत लिया है॥ २१॥✎ 1971