श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्र नित्यवयोरूपाः श्यामा विरजवाससः।

भ्राजन्ते रूपवन्‍नार्यो ह्यर्चिर्भिरिव वह्नयः॥ १७

yatra nityavayorūpāḥ śyāmā virajavāsasaḥ|

bhrājante rūpavannāryo hyarcirbhiriva vahnayaḥ|| 17

अर्थ

वहाँकी स्त्रियाँ सर्वदा सोलह वर्षकी-सी रहती हैं, उनका यौवन और सौन्दर्य स्थिर रहता है। वे निर्मल वस्त्र पहनकर अपने रूपकी छटासे इस प्रकार देदीप्यमान होती हैं, जैसे अपनी ज्वालाओंसे अग्‍नि॥ १७॥

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