श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.13.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

योऽसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः।

निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनाऽऽस्ते स्वराडिव॥ १४

yo'sau bhagavatā baddhaḥ prītena sutale punaḥ|

niveśito'dhike svargādadhunā''ste svarāḍiva|| 14

अर्थ

विष्णुभगवान्‌ने वामन अवतार ग्रहण करके इन्हींसे तीन पग पृथ्वी माँगी थी; परन्तु इन्होंने उनको सारी त्रिलोकी दे दी। राजा बलिको एक बार तो भगवान्‌ने बाँध दिया था, परन्तु फिर प्रसन्‍न होकर उन्होंने इनको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ सुतल लोकका राज्य दे दिया। वे इस समय वहीं इन्द्रके समान विराजमान हैं। आगे चलकर ये ही इन्द्र होंगे और समस्त ऐश्‍वर्योंसे परिपूर्ण इन्द्रपदका भी परित्याग करके परम सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ १३-१४॥✎ 742 743

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #742 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #743 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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