॥ श्रीहरिः ॥
तवैव चरणाम्भोजं श्रेयस्कामा निराशिषः।
विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते॥ ६
tavaiva caraṇāmbhojaṃ śreyaskāmā nirāśiṣaḥ|
visṛjyobhayataḥ saṅgaṃ munayaḥ samupāsate|| 6
अर्थ
कल्याणकामी महात्मालोग इस लोक और परलोक दोनोंकी आसक्ति एवं समस्त कामनाओंका परित्याग करके आपके चरणकमलोंकी ही आराधना करते हैं॥ ६॥
तवैव चरणाम्भोजं श्रेयस्कामा निराशिषः।
विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते॥ ६
कल्याणकामी महात्मालोग इस लोक और परलोक दोनोंकी आसक्ति एवं समस्त कामनाओंका परित्याग करके आपके चरणकमलोंकी ही आराधना करते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 963) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/6/