श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नमुचिः पञ्चदशभिः स्वर्णपुङ्खैर्महेषुभिः।

आहत्य व्यनदत्संख्ये सतोय इव तोयदः॥ २३

namuciḥ pañcadaśabhiḥ svarṇapuṅkhairmaheṣubhiḥ|

āhatya vyanadatsaṃkhye satoya iva toyadaḥ|| 23

अर्थ

नमुचिने बड़े-बड़े पंद्रह बाणोंसे, जिनमें सोनेके पंख लगे हुए थे, इन्द्रको मारा और युद्धभूमिमें वह जलसे भरे बादलके समान गरजने लगा॥ २३॥✎ 1978

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