माली और सुमाली—दो दैत्य बड़े बलवान् थे, भगवान्ने युद्धमें अपने चक्रसे उनके सिर भी काट डाले और वे निर्जीव होकर गिर पड़े। तदनन्तर माल्यवान्ने अपनी प्रचण्ड गदासे गरुड़पर बड़े वेगके साथ प्रहार किया। परन्तु गर्जना करते हुए माल्यवान्के प्रहार करते-न-करते ही भगवान्ने चक्रसे उसके सिरको भी धड़से अलग कर दिया॥ ५७॥✎ 726727728729
माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-
च्चक्रेण कृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम्।
आहत्य तिग्मगदयाहनदण्डजेन्द्रं
तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः॥ ५७
माली और सुमाली—दो दैत्य बड़े बलवान् थे, भगवान्ने युद्धमें अपने चक्रसे उनके सिर भी काट डाले और वे निर्जीव होकर गिर पड़े। तदनन्तर माल्यवान्ने अपनी प्रचण्ड गदासे गरुड़पर बड़े वेगके साथ प्रहार किया। परन्तु गर्जना करते हुए माल्यवान्के प्रहार करते-न-करते ही भगवान्ने चक्रसे उसके सिरको भी धड़से अलग कर दिया॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 957) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)