श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.48

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यातुधान्यश्‍च शतशः शूलहस्ता विवाससः।

छिन्धि भिन्धीति वादिन्यस्तथा रक्षोगणाः प्रभो॥ ४८

yātudhānyaśca śataśaḥ śūlahastā vivāsasaḥ|

chindhi bhindhīti vādinyastathā rakṣogaṇāḥ prabho|| 48

अर्थ

परीक्षित्! हाथोंमें शूल लिये ‘मारो-काटो’ इस प्रकार चिल्लाती हुई सैकड़ों नंग-धड़ंग राक्षसियाँ और राक्षस भी वहाँ प्रकट हो गये॥ ४८॥

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