श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.20

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

द्विमूर्धा कालनाभोऽथ प्रहेतिर्हेतिरिल्वलः।

शकुनिर्भूतसंतापो वज्रदंष्ट्रो विरोचनः॥ २०

dvimūrdhā kālanābho'tha prahetirhetirilvalaḥ|

śakunirbhūtasaṃtāpo vajradaṃṣṭro virocanaḥ|| 20

अर्थ

उनके चारों ओर अपने-अपने विमानोंपर सेनाकी छोटी-छोटी टुकड़ियोंके स्वामी नमुचि, शम्बर, बाण, विप्रचित्ति, अयोमुख, द्विमूर्धा, कालनाभ, प्रहेति, हेति, इल्वल, शकुनि, भूतसन्ताप, वज्रदंष्ट्र, विरोचन, हयग्रीव, शंकुशिरा, कपिल, मेघदुन्दुभि, तारक, चक्राक्ष, शुम्भ, निशुम्भ, जम्भ, उत्कल, अरिष्ट, अरिष्टनेमि, त्रिपुराधिपति मय, पौलोम कालेय और निवातकवच आदि स्थित थे॥ १९—२२॥✎ 2032 2033

यह अर्थ श्लोक 19–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2032 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2033 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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