राजन्! भगवान्ने समुद्रको मथकर अमृत निकाला और अपने निजजन देवताओंको पिला दिया। फिर सबके देखते-देखते वे गरुड़पर सवार हुए और वहाँसे चले गये॥ २॥✎ 723724
साधयित्वामृतं राजन्पाययित्वा स्वकान्सुरान्।
पश्यतां सर्वभूतानां ययौ गरुडवाहनः॥ २
राजन्! भगवान्ने समुद्रको मथकर अमृत निकाला और अपने निजजन देवताओंको पिला दिया। फिर सबके देखते-देखते वे गरुड़पर सवार हुए और वहाँसे चले गये॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 951) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)