श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विरक्तः कामभोगेषु शतरूपापतिः प्रभुः।

विसृज्य राज्यं तपसे सभार्यो वनमाविशत्॥ ७

viraktaḥ kāmabhogeṣu śatarūpāpatiḥ prabhuḥ|

visṛjya rājyaṃ tapase sabhāryo vanamāviśat|| 7

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् स्वायम्भुव मनुने समस्त कामनाओं और भोगोंसे विरक्त होकर राज्य छोड़ दिया। वे अपनी पत्‍नी शतरूपाके साथ तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये॥ ७॥✎ 650

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #650 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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