॥ श्रीहरिः ॥
सोऽनृतव्रतदुःशीलानसतो यक्षराक्षसान्।
भूतद्रुहो भूतगणांस्त्ववधीत् सत्यजित्सखः॥ २६
so'nṛtavrataduḥśīlānasato yakṣarākṣasān|
bhūtadruho bhūtagaṇāṃstvavadhīt satyajitsakhaḥ|| 26
अर्थ
उस समयके इन्द्र सत्यजित्के सखा बनकर भगवान्ने असत्यपरायण, दुःशील और दुष्ट यक्षों, राक्षसों एवं जीवद्रोही भूतगणोंका संहार किया॥ २६॥✎ 652 653
सोऽनृतव्रतदुःशीलानसतो यक्षराक्षसान्।
भूतद्रुहो भूतगणांस्त्ववधीत् सत्यजित्सखः॥ २६
उस समयके इन्द्र सत्यजित्के सखा बनकर भगवान्ने असत्यपरायण, दुःशील और दुष्ट यक्षों, राक्षसों एवं जीवद्रोही भूतगणोंका संहार किया॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.1.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 908) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/1/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #652 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने
- #653 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् ने → पुरुषोत्तमभगवान्ने