श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अष्टाशीतिसहस्राणि मुनयो ये धृतव्रताः।

अन्वशिक्ष१न्व्रतं तस्य कौमारब्रह्मचारिणः॥ २२

aṣṭāśītisahasrāṇi munayo ye dhṛtavratāḥ|

anvaśikṣanvrataṃ tasya kaumārabrahmacāriṇaḥ|| 22

अर्थ

वे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहे। उन्हींके आचरणसे शिक्षा ग्रहण करके अठासी हजार व्रतनिष्ठ ऋषियोंने भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया॥ २२॥✎ 651

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—शिक्षन्सुतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 908)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #651 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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