श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.54

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

युष्मभ्यं याचितोऽश्विभ्यां धर्मज्ञोऽङ्गानि दास्यति।

ततस्तैरायुधश्रेष्ठो विश्‍वकर्मविनिर्मितः।

येन वृत्रशिरो हर्ता मत्तेज उपबृंहितः॥ ५४

yuṣmabhyaṃ yācito'śvibhyāṃ dharmajño'ṅgāni dāsyati|

tatastairāyudhaśreṣṭho viśvakarmavinirmitaḥ|

yena vṛtraśiro hartā matteja upabṛṃhitaḥ|| 54

अर्थ

दधीचि ऋषि धर्मके परम मर्मज्ञ हैं। वे तुमलोगोंको अश्विनीकुमारके माँगनेपर, अपने शरीरके अंग अवश्य दे देंगे। इसके बाद विश्‍वकर्माके द्वारा उन अंगोंसे एक श्रेष्ठ आयुध तैयार करा लेना। देवराज! मेरी शक्तिसे युक्त होकर तुम उसी शस्त्रके द्वारा वृत्रासुरका सिर काट लोगे॥ ५४॥

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