॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.41
अस्माकं तावकानां तव नतानां तत ततामह तव चरणनलिनयुगलध्यानानुबद्धहृदयनिगडानां स्वलिङ्गविवरणेनात्मसात्कृतानामनुकम्पानुरंजितविशदरुचिरशिशिरस्मितावलोकेन विगलितमधुरमुखरसामृतकलया चान्तस्तापम् अनघ अर्हसि शमयितुम्॥ ४१॥
asmākaṃ tāvakānāṃ tava natānāṃ tata tatāmaha tava caraṇanalinayugaladhyānānubaddhahṛdayanigaḍānāṃ svaliṅgavivaraṇenātmasātkṛtānāmanukampānuraṃjitaviśadaruciraśiśirasmitāvalokena vigalitamadhuramukharasāmṛtakalayā cāntastāpam anagha arhasi śamayitum|| 41||
अर्थ
भगवन्! आप हमारे पिता, पितामह—सब कुछ हैं। हम आपके निजजन हैं और निरन्तर आपके सामने सिर झुकाये रहते हैं। आपके चरणकमलोंका ध्यान करते-करते हमारा हृदय उन्हींके प्रेमबन्धनसे बँध गया है। आपने हमारे सामने अपना दिव्यगुणोंसे युक्त साकार विग्रह प्रकट करके हमें अपनाया है। इसलिये प्रभो! हम आपसे यह प्रार्थना करते हैं कि आप अपनी दयाभरी, विशद, सुन्दर और शीतल मुसकानयुक्त चितवनसे तथा अपने मुखारविन्दसे टपकते हुए मनोहर वाणीरूप सुमधुर सुधाबिन्दुसे हमारे हृदयका ताप शान्त कीजिये, हमारे अन्तरकी जलन बुझाइये॥ ४१॥