श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्रं दिने दिने।

दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम्॥ १३

viṣvagvivardhamānaṃ tamiṣumātraṃ dine dine|

dagdhaśailapratīkāśaṃ sandhyābhrānīkavarcasam|| 13

अर्थ

परीक्षित्! वह प्रतिदिन अपने शरीरके सब ओर बाणके बराबर बढ़ जाया करता था। वह जले हुए पहाड़के समान काला और बड़े डील-डौलका था। उसके शरीरमेंसे सन्ध्याकालीन बादलोंके समान दीप्ति निकलती रहती थी॥ १३॥

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