श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जो पुरुष इस नारायणकवचको समयपर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदरसे झुक जाते हैं और वह सब प्रकारके भयोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात्॥ ४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जो पुरुष इस नारायणकवचको समयपर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदरसे झुक जाते हैं और वह सब प्रकारके भयोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 743) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/8/41/