श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.23

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि

भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।

दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु

कक्षं यथा वातसखो हुताशः॥ २३

cakraṃ yugāntānalatigmanemi

bhramat samantād bhagavatprayuktam|

dandagdhi dandagdhyarisainyamāśu

kakṣaṃ yathā vātasakho hutāśaḥ|| 23

अर्थ

‘सुदर्शन! आपका आकार चक्र (रथके पहिये)- की तरह है। आपके किनारेका भाग प्रलयकालीन अग्‍निके समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान्‌की प्रेरणासे सब ओर घूमते रहते हैं। जैसे आग वायुकी सहायतासे सूखे घास-फूसको जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रु-सेनाको शीघ्र-से-शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये॥ २३॥✎ 514

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #514 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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