श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.34

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः।

स विश्‍वरूपस्तानाह प्रसन्‍नः श्लक्ष्णया गिरा॥ ३४

abhyarthitaḥ suragaṇaiḥ paurohitye mahātapāḥ|

sa viśvarūpastānāha prasannaḥ ślakṣṇayā girā|| 34

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्‍वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्‍वरूपने प्रसन्‍न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा॥ ३४॥

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