श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्वरूपने प्रसन्न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा॥ ३४॥
अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः।
स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा॥ ३४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्वरूपने प्रसन्न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 737) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/34/