॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.7.24
त्रिविष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य-
मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्थाः।
न विप्रगोविन्दगवीश्वराणां
भवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम्॥ २४
triviṣṭapaṃ kiṃ gaṇayantyabhedya-
mantrā bhṛgūṇāmanuśikṣitārthāḥ|
na vipragovindagavīśvarāṇāṃ
bhavantyabhadrāṇi nareśvarāṇām|| 24
अर्थ
भृगुवंशियोंने इन्हें अर्थशास्त्रकी पूरी-पूरी शिक्षा दे रखी है। ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगोंको नहीं मिल पाता। उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है। ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल नहीं होता॥ २४॥