श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन् भगवान् स्वराट्।

ध्यायन् धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः॥ १७

gurornādhigataḥ saṃjñāṃ parīkṣan bhagavān svarāṭ|

dhyāyan dhiyā surairyuktaḥ śarma nālabhatātmanaḥ|| 17

अर्थ

देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढुँढ़वाया; परन्तु उनका कहीं पता न चला। तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परन्तु वे कुछ भी सोच न सके! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा॥ १७॥

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