श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम्।

प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन्॥ १५

athāhamamarācāryamagādhadhiṣaṇaṃ dvijam|

prasādayiṣye niśaṭhaḥ śīrṣṇā taccaraṇaṃ spṛśan|| 15

अर्थ

मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’॥ १५॥

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