‘हाय-हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है॥ ११॥
अहो बत ममासाधु कृतं वै दभ्रबुद्धिना।
यन्मयैश्वर्यमत्तेन गुरुः सदसि कात्कृतः॥ ११
‘हाय-हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 735) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/11/