बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण
राजोवाच
कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः।
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ॥ १
kasya hetoḥ parityaktā ācāryeṇātmanaḥ surāḥ|
etadācakṣva bhagavañchiṣyāṇāmakramaṃ gurau|| 1
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये॥ १॥
कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः।
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ॥ १
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 734) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/1/