श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.39

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः।

ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम्॥ ३९

nanu bhāgavatā nityaṃ bhūtānugrahakātarāḥ|

ṛte tvāṃ sauhṛdaghnaṃ vai vairaṅkaramavairiṇām|| 39

अर्थ

मैं जानता हूँ कि भगवान्‌के पार्षद सदा-सर्वदा दुःखी प्राणियोंपर दया करनेके लिये व्यग्र रहते हैं। परन्तु तुम प्रेमभावका विनाश करनेवाले हो। तुम उन लोगोंसे भी वैर करते हो, जो किसीसे वैर नहीं करते॥ ३९॥

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