श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.29

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इति तानपि राजेन्द्र प्रतिसर्गधियो मुनिः।

उपेत्य नारदः प्राह वाचःकूटानि पूर्ववत्॥ २९

iti tānapi rājendra pratisargadhiyo muniḥ|

upetya nāradaḥ prāha vācaḥkūṭāni pūrvavat|| 29

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्‍व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे। उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहलेके समान ही कूट वचन कहे॥ २९॥

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