॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.5.12
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान् स्वाश्रयः परः।
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १२
eka eveśvarasturyo bhagavān svāśrayaḥ paraḥ|
tamadṛṣṭvābhavaṃ puṃsaḥ kimasatkarmabhirbhavet|| 12
अर्थ
सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियोंसे भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परन्तु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान् हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है?॥ १२॥