श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे—॥ १०॥
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया।
वाचःकूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया॥ १०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे—॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 725) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/10/