श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.46

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।

अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः॥ ४६✎ 1909

tapo me hṛdayaṃ brahmaṃstanurvidyā kriyā''kṛtiḥ|

aṅgāni kratavo jātā dharma ātmāsavaḥ surāḥ|| 46

अर्थ

ब्रह्मन्! तपस्या मेरा हृदय है, विद्या शरीर है, कर्म आकृति है, यज्ञ अंग हैं, धर्म मन है और देवता प्राण हैं॥ ४६॥✎ 512

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1909 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुरा:४६ → सुराः॥ ४६

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