प्रजापते! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत्के समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों॥ ४४॥✎ 512
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः।
ममैष कामो भूतानां यद् भूयासुर्विभूतयः॥ ४४
प्रजापते! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत्के समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 723) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/4/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने