श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.39

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रत् त्रिभुवनेश्‍वरः।

वृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः॥ ३९

trailokyamohanaṃ rūpaṃ bibhrat tribhuvaneśvaraḥ|

vṛto nāradanandādyaiḥ pārṣadaiḥ surayūthapaiḥ|| 39

अर्थ

त्रिभुवनपति भगवान्‌ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था। नारद, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्‍वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्‌के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्‍चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये॥ ३९-४०॥✎ 511

यह अर्थ श्लोक 39–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #511 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें