श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स वै ममाशेषविशेषमाया-

निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।

स सर्वनामा स च विश्‍वरूपः

प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८

sa vai mamāśeṣaviśeṣamāyā-

niṣedhanirvāṇasukhānubhūtiḥ |

sa sarvanāmā sa ca viśvarūpaḥ

prasīdatāmaniruktātmaśaktiḥ || 28

अर्थ

जगत‍्में जितनी भिन्‍नताएँ देख पड़ती हैं, वे सब मायाकी ही हैं। मायाका निषेध कर देनेपर केवल परम सुखके साक्षात्कारस्वरूप आप ही अवशेष रहते हैं। परन्तु जब विचार करने लगते हैं, तब आपके स्वरूपमें मायाकी उपलब्धि—निर्वचन नहीं हो सकता। अर्थात् माया भी आप ही हैं। अतः सारे नाम और सारे रूप आपके ही हैं। प्रभो! आप मुझपर प्रसन्‍न होइये। मुझे आत्मप्रसादसे पूर्ण कर दीजिये॥ २८॥

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