श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यदोपरामो मनसो नामरूप-

रूपस्य दृष्टस्मृतिसम्प्रमोषात्।

य ईयते केवलया स्वसंस्थया१

हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः॥ २६

yadoparāmo manaso nāmarūpa-

rūpasya dṛṣṭasmṛtisampramoṣāt|

ya īyate kevalayā svasaṃsthayā

haṃsāya tasmai śucisadmane namaḥ|| 26

अर्थ

जब समाधिकालमें प्रमाण, विकल्प और विपर्ययरूप विविध ज्ञान और स्मरणशक्तिका लोप हो जानेसे इस नाम-रूपात्मक जगत‍्का निरूपण करनेवाला मन उपरत हो जाता है, उस समय बिना मनके भी केवल सच्चिदानन्दमयी अपनी स्वरूपस्थितिके द्वारा आप प्रकाशित होते रहते हैं। प्रभो! आप शुद्ध हैं और शुद्ध हृदय-मन्दिर ही आपका निवासस्थान है। आपको मेरा नमस्कार है॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स्वसंज्ञया।

    (मुद्रित पृष्ठ 720)

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