यदि संसारमें दण्ड देनेवाले बहुत-से शासक हों, तो किसे सुख मिले और किसे दुःख—इसकी व्यवस्था एक-सी न हो सकेगी॥ ५॥
यदि स्युर्बहवो लोके शास्तारो दण्डधारिणः।
कस्य स्यातां न वा कस्य मृत्युश्चामृतमेव वा॥ ५
यदि संसारमें दण्ड देनेवाले बहुत-से शासक हों, तो किसे सुख मिले और किसे दुःख—इसकी व्यवस्था एक-सी न हो सकेगी॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.3.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 712) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/3/5/