श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा

हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते।

आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां

चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम्॥ १६

yaṃ vai na gobhirmanasāsubhirvā

hṛdā girā vāsubhṛto vicakṣate|

ātmānamantarhṛdi santamātmanāṃ

cakṣuryathaivākṛtayastataḥ param|| 16

अर्थ

दूतो! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान् पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्रको नहीं देख सकते—वैसे ही अन्तःकरणमें अपने साक्षीरूपसे स्थित परमात्माको कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय या वाणी आदि किसी भी साधनके द्वारा नहीं जान सकता॥ १६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें