svayaṃ dharmamadharmaṃ vā na hi veda yathā paśuḥ|| 5
अर्थ
साधारण लोग पशुओंके समान धर्म और अधर्मका स्वरूप न जानकर किसी सत्पुरुषपर विश्वास कर लेते हैं, उसकी गोदमें सिर रखकर निर्भय और निश्चिन्त सो जाते हैं॥ ५॥
यस्याङ्के शिर आधाय लोकः स्वपिति निर्वृतः।
स्वयं धर्ममधर्मं वा न हि वेद यथा पशुः॥ ५
साधारण लोग पशुओंके समान धर्म और अधर्मका स्वरूप न जानकर किसी सत्पुरुषपर विश्वास कर लेते हैं, उसकी गोदमें सिर रखकर निर्भय और निश्चिन्त सो जाते हैं॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 703) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/5/