भगवान्की मायाने स्त्रीका रूप धारण करके मुझ अधमको फाँस लिया और क्रीडामृगकी भाँति मुझे बहुत नाच नचाया। अब मैं अपने-आपको उस मायासे मुक्त करूँगा॥ ३७॥✎ 498
मोचये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्याऽऽत्ममायया।
विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधमः॥ ३७
भगवान्की मायाने स्त्रीका रूप धारण करके मुझ अधमको फाँस लिया और क्रीडामृगकी भाँति मुझे बहुत नाच नचाया। अब मैं अपने-आपको उस मायासे मुक्त करूँगा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 710) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)