मैं कितना नीच हूँ! मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ॥ २८॥✎ 497
वृद्धावनाथौ पितरौ नान्यबन्धू तपस्विनौ।
अहो मयाधुना त्यक्तावकृतज्ञेन नीचवत्॥ २८
मैं कितना नीच हूँ! मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 709) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)