श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वृद्धावनाथौ पितरौ नान्यबन्धू तपस्विनौ।

अहो मयाधुना त्यक्तावकृतज्ञेन नीचवत्॥ २८

vṛddhāvanāthau pitarau nānyabandhū tapasvinau|

aho mayādhunā tyaktāvakṛtajñena nīcavat|| 28

अर्थ

मैं कितना नीच हूँ! मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ॥ २८॥✎ 497

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #497 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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