श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहो मे परमं कष्टमभूदविजितात्मनः।

येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायताऽऽत्मना॥ २६

aho me paramaṃ kaṣṭamabhūdavijitātmanaḥ|

yena viplāvitaṃ brahma vṛṣalyāṃ jāyatā''tmanā|| 26

अर्थ

(अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियोंका दास हूँ! मैंने एक दासीके गर्भसे पुत्र उत्पन्‍न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःखकी बात है॥ २६॥✎ 497

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #497 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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