(अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियोंका दास हूँ! मैंने एक दासीके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःखकी बात है॥ २६॥✎ 497
अहो मे परमं कष्टमभूदविजितात्मनः।
येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायताऽऽत्मना॥ २६
(अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियोंका दास हूँ! मैंने एक दासीके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःखकी बात है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 709) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)